भाग 2: "बंद दरवाज़े का रहस्य – वापसी"
Budget: ₹750 – ₹1,250 INR
भाग 2: "बंद दरवाज़े का रहस्य – वापसी"
समय: एक साल बाद — 15 दिसंबर
नया पात्र: श्रेया (अविनाश की बहन)
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कहानी शुरू होती है...
"भाई का फोन आखिरी बार उसी कमरे में बंद मिला था…"
श्रेया हर रात यही सोचती। पुलिस ने केस बंद कर दिया था, सबने मान लिया कि अविनाश कहीं गुम हो गया।
लेकिन श्रेया नहीं मानी।
एक साल बाद, 15 दिसंबर की रात, श्रेया उसी बंगले में पहुँची।
ठंड, कोहरा और पहाड़ियों की नीरवता में वो कमरा अब और भी डरावना लग रहा था।
पर श्रेया डरी नहीं।
उसके हाथ में था भाई का वही पुराना मोबाइल — जो अब भी अजीब तरह से हर 15 दिसंबर को अपने आप ऑन हो जाता था।
---
रात 12:00 बजे
कमरे का दरवाज़ा फिर से खुद-ब-खुद खुल गया।
अंदर सब कुछ वैसा ही था — झूला, तस्वीर, धूल और… झूले पर बैठी एक लड़की की परछाई!
श्रेया ने ज़ोर से पूछा —
“भाई कहाँ है?!”
उस परछाई ने धीरे से कहा:
"जिसे ये घर चुनता है, वो यहीं रह जाता है..."
श्रेया डरती नहीं, आगे बढ़ती है।
और तभी… झूले के पीछे से एक संदूक (Trunk) निकलता है।
वो खोलती है — उसमें एक पुरानी डायरी और एक रंगीन स्कार्फ होता है… वही स्कार्फ जो अविनाश की माँ ने उसे दिया था!
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डायरी में लिखा था:
> “अगर कोई ये पढ़ रहा है, तो समझो मैंने उस कमरे का राज़ समझ लिया है…
यह सिर्फ एक कमरा नहीं, समय का फँसा हुआ दरवाज़ा है।
मैं अब इस ‘बीते समय’ में अटका हूँ —
इस लड़की की आत्मा को मुक्ति दिलाने से पहले मैं बाहर नहीं जा सकता।
कृपया उसे माफ कर दो… और झूले को आग के हवाले कर दो।”
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श्रेया का निर्णय
श्रेया नीचे से मिट्टी का तेल लाती है, झूले को बाहर निकालती है…
और जैसे ही आग लगाती है — एक जोरदार चीख सुनाई देती है!
“अब... मैं आज़ाद हूँ...”
बंगले के ऊपर से एक सफ़ेद धुंध उठती है… और कमरे की तस्वीर अचानक जल जाती है।
---
अंत...?
अगले दिन पुलिस को बंगला खाली मिला, लेकिन कमरे में एक नई फोटो टंगी थी —
श्रेया और अविनाश… दोनों मुस्कराते हुए।
कोई नहीं जानता वो तस्वीर कब और कैसे ली गई।
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क्या आप चाहेंगे कि मैं भाग 3 बनाऊँ — "श्रेया अब कहाँ है?"
समय: एक साल बाद — 15 दिसंबर
नया पात्र: श्रेया (अविनाश की बहन)
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कहानी शुरू होती है...
"भाई का फोन आखिरी बार उसी कमरे में बंद मिला था…"
श्रेया हर रात यही सोचती। पुलिस ने केस बंद कर दिया था, सबने मान लिया कि अविनाश कहीं गुम हो गया।
लेकिन श्रेया नहीं मानी।
एक साल बाद, 15 दिसंबर की रात, श्रेया उसी बंगले में पहुँची।
ठंड, कोहरा और पहाड़ियों की नीरवता में वो कमरा अब और भी डरावना लग रहा था।
पर श्रेया डरी नहीं।
उसके हाथ में था भाई का वही पुराना मोबाइल — जो अब भी अजीब तरह से हर 15 दिसंबर को अपने आप ऑन हो जाता था।
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रात 12:00 बजे
कमरे का दरवाज़ा फिर से खुद-ब-खुद खुल गया।
अंदर सब कुछ वैसा ही था — झूला, तस्वीर, धूल और… झूले पर बैठी एक लड़की की परछाई!
श्रेया ने ज़ोर से पूछा —
“भाई कहाँ है?!”
उस परछाई ने धीरे से कहा:
"जिसे ये घर चुनता है, वो यहीं रह जाता है..."
श्रेया डरती नहीं, आगे बढ़ती है।
और तभी… झूले के पीछे से एक संदूक (Trunk) निकलता है।
वो खोलती है — उसमें एक पुरानी डायरी और एक रंगीन स्कार्फ होता है… वही स्कार्फ जो अविनाश की माँ ने उसे दिया था!
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डायरी में लिखा था:
> “अगर कोई ये पढ़ रहा है, तो समझो मैंने उस कमरे का राज़ समझ लिया है…
यह सिर्फ एक कमरा नहीं, समय का फँसा हुआ दरवाज़ा है।
मैं अब इस ‘बीते समय’ में अटका हूँ —
इस लड़की की आत्मा को मुक्ति दिलाने से पहले मैं बाहर नहीं जा सकता।
कृपया उसे माफ कर दो… और झूले को आग के हवाले कर दो।”
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श्रेया का निर्णय
श्रेया नीचे से मिट्टी का तेल लाती है, झूले को बाहर निकालती है…
और जैसे ही आग लगाती है — एक जोरदार चीख सुनाई देती है!
“अब... मैं आज़ाद हूँ...”
बंगले के ऊपर से एक सफ़ेद धुंध उठती है… और कमरे की तस्वीर अचानक जल जाती है।
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अंत...?
अगले दिन पुलिस को बंगला खाली मिला, लेकिन कमरे में एक नई फोटो टंगी थी —
श्रेया और अविनाश… दोनों मुस्कराते हुए।
कोई नहीं जानता वो तस्वीर कब और कैसे ली गई।
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क्या आप चाहेंगे कि मैं भाग 3 बनाऊँ — "श्रेया अब कहाँ है?"
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