कहानी: "बंद दरवाज़े का रहस्य" Part-1
Budget: ₹750 – ₹1,250 INR
स्थान: शिमला का एक पुराना पहाड़ी बंगला
समय: दिसंबर की ठंडी रात, 11:45 बजे
---
कहानी शुरू होती है...
"इस कमरे में पिछले दस सालों से कोई नहीं गया..."
रघु काका की आवाज़ ठंडी हवा से भी ज़्यादा सर्द थी।
अविनाश, जो दिल्ली से शिमला अपनी छुट्टियाँ बिताने आया था, मुस्करा कर बोला —
"अच्छा काका! कोई भूत-वूत की कहानी है क्या?"
काका ने बस एक रहस्यमयी निगाह डाली और धीमे से कहा,
"तू नहीं समझेगा, बेटा... वो कमरा अपने आप खुलता है... और कोई अंदर जाता है तो लौटता नहीं।"
अविनाश को तो जैसे मज़ा ही आने लगा। अगली ही रात उसने ठान लिया — वो उस बंद कमरे का रहस्य जानकर रहेगा।
---
रात 12:03 बजे
अविनाश के हाथ में टॉर्च थी, दिल में हल्की घबराहट...
जैसे ही वह बंगले की तीसरी मंज़िल पर पहुँचा, कमरे का दरवाज़ा खुद-ब-खुद "चिर्र्र्र..." की आवाज़ से खुल गया।
कमरा एकदम सूनसान था।
धूल जमी चीज़ें, एक पुराना झूला, और दीवार पर एक लड़की की धुंधली सी तस्वीर...
अविनाश ने जैसे ही झूले को हाथ लगाया, झूला हिलने लगा — अपने आप!
और तभी पीछे से किसी ने धीरे से फुसफुसाया:
"तुम देर से आए हो... मैं तुम्हारा ही इंतज़ार कर रही थी..."
अविनाश ने पलटकर देखा — कोई नहीं था।
---
अगली सुबह
रघु काका दरवाज़ा खटखटाते रहे।
कोई जवाब नहीं आया।
दरवाज़ा अंदर से बंद था।
पुलिस आई। दरवाज़ा तोड़ा गया।
कमरे में सिर्फ एक चीज़ मिली —
अविनाश का फोन...
और उसमें रिकॉर्ड हुई एक आवाज़:
> "मैं जानता था, कोई न कोई आएगा... लेकिन अब बहुत देर हो चुकी है। मैं अब उसी के साथ हूं... हमेशा के लिए।"
---
कहानी का अंत...?
नहीं। उस कमरे में आज भी हर साल 15 दिसंबर की रात को फिर से झूला हिलता है... और कोई आहट होती है।
क्या आप उस कमरे में जाना चाहेंगे?
समय: दिसंबर की ठंडी रात, 11:45 बजे
---
कहानी शुरू होती है...
"इस कमरे में पिछले दस सालों से कोई नहीं गया..."
रघु काका की आवाज़ ठंडी हवा से भी ज़्यादा सर्द थी।
अविनाश, जो दिल्ली से शिमला अपनी छुट्टियाँ बिताने आया था, मुस्करा कर बोला —
"अच्छा काका! कोई भूत-वूत की कहानी है क्या?"
काका ने बस एक रहस्यमयी निगाह डाली और धीमे से कहा,
"तू नहीं समझेगा, बेटा... वो कमरा अपने आप खुलता है... और कोई अंदर जाता है तो लौटता नहीं।"
अविनाश को तो जैसे मज़ा ही आने लगा। अगली ही रात उसने ठान लिया — वो उस बंद कमरे का रहस्य जानकर रहेगा।
---
रात 12:03 बजे
अविनाश के हाथ में टॉर्च थी, दिल में हल्की घबराहट...
जैसे ही वह बंगले की तीसरी मंज़िल पर पहुँचा, कमरे का दरवाज़ा खुद-ब-खुद "चिर्र्र्र..." की आवाज़ से खुल गया।
कमरा एकदम सूनसान था।
धूल जमी चीज़ें, एक पुराना झूला, और दीवार पर एक लड़की की धुंधली सी तस्वीर...
अविनाश ने जैसे ही झूले को हाथ लगाया, झूला हिलने लगा — अपने आप!
और तभी पीछे से किसी ने धीरे से फुसफुसाया:
"तुम देर से आए हो... मैं तुम्हारा ही इंतज़ार कर रही थी..."
अविनाश ने पलटकर देखा — कोई नहीं था।
---
अगली सुबह
रघु काका दरवाज़ा खटखटाते रहे।
कोई जवाब नहीं आया।
दरवाज़ा अंदर से बंद था।
पुलिस आई। दरवाज़ा तोड़ा गया।
कमरे में सिर्फ एक चीज़ मिली —
अविनाश का फोन...
और उसमें रिकॉर्ड हुई एक आवाज़:
> "मैं जानता था, कोई न कोई आएगा... लेकिन अब बहुत देर हो चुकी है। मैं अब उसी के साथ हूं... हमेशा के लिए।"
---
कहानी का अंत...?
नहीं। उस कमरे में आज भी हर साल 15 दिसंबर की रात को फिर से झूला हिलता है... और कोई आहट होती है।
क्या आप उस कमरे में जाना चाहेंगे?
Related categories:
Data Entry
Research
Excel
Word
Microsoft Office
User Story Writing
Microsoft Word